Free BEVAE-181 Solved Assignment Hindi Medium (2020-21)

B.E.V.A.E-181

पर्यावरण अध्ययन पर क्षमता वर्धक अनिवार्य पाठ्यक्रम

खंड – क

1 (क) दैनिक जीवन में पर्यावरण के महत्त्व को उदाहरण सहित 120 शब्दों में वर्णन कीजिए।

उत्तर – पर्यावरण अध्ययन हमें पर्यावरण की सुरक्षा और संरक्षण की जानकारी देता है। वर्तमान में, हमारी आक्रमक उपभोक्‍तावादी जीवनशैली और कार्बन सघन औद्योगिक विकास के कारण हमने बड़ी संख्या में पर्यावरणीय मुद्दों को स्थानीय, क्षेत्रीय और विश्व स्तर पर परिमाण, प्रबलता और जटिलता दोनों के संदर्भ में जन्म दिया है| अब हम पर्यावरण के प्रमुख मुद्दों की आगामी अनुभागों में चर्चा करते हैं।

1. पर्यावरणीय मुद्दे अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व के हैं: यह अब अच्छी तरीके से समझ लिया गया है कि पर्यावरणीय मुद्दे जैसे भूमंडलीय तापन और जलवायु परिवर्तन ओज़ोन परत की क्षीणता प्रदूषण और जैवविविधता की हानि महज राष्ट्रीय मुद्दे नहीं बल्कि वैश्विक मुद्दे हैं अतः इनका मुकाबला अन्तर्राष्ट्रीय प्रयासाँ और सहयोग से किया जाना चाहिए।

2. आधुनिकीकरण और विकास के कारण समस्याओं का आविर्भाव: आधुनिक काल में विकास ने औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, आधुनिक परिवहन प्रणालियों, कृषि, आवास इत्यादि को जन्म दिया है। जब पश्चिम का विकास हुआ तो ऐसा संभवतः उसके क्रियाकलापों के पर्यावरणीय प्रभावों की अज्ञानता के कारण हुआ था। स्पष्ट रूप से ऐसा पथ न तो व्यवहारिक और न ही वांछनीय है। विकासशील जगत्‌ अब पर्यावरणीय निम्नीकरण के बगैर विकास करने की चुनौती का सामना कर रहा है।

3. जनसंख्या में विस्फोटक वृद्धिःविश्व जनगणना दर्शाती है कि पृथ्वी का प्रति सात में से एक व्यक्ति भारत में रहता है। स्पष्ट तौर पर विश्व जनसंख्या के 16 प्रतिशत और सिर्फ 2.4 प्रतिशत भूमि क्षेत्रफल के साथ भूमि समेत सभी प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव है। यह प्राकृतिक संसाधनों में सभी के हित के लिए कुशल प्रबंधन की आवश्यकता को महत्व देता है।

4. वैकल्पिक समाधान की आवश्यकता: यह विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए अनिवार्य है कि वे विकास के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए वैकल्पिक पथ की तलाश करें। यह लक्ष्य विकसित जगत्‌ से इस मायने में भिन्‍न होना चाहिए कि इसमें प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो सके और व्यर्थ उपभोग से बचा जा सके |

5. विकास की विवेकपूर्ण योजना की आवश्यकता: संसाधनों की निकासी, प्रसकरण और उत्पादों का उपयोग सभी को विकास की किसी भी योजना में पारिस्थितिक चक्रों के साथ समक्रमिक होना चाहिए। हमारे कार्यालय पर्यावरण और विकास के सतत होने के लिए नियोजित होने चाहिए |

(ख) “सतत्‌ विकास एक लक्ष्य जिसकी प्राप्ति के लिए सभी मानव समाजों को प्रयत्नशील रहना चाहिए।” इस कथन को 120 शब्दों में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ऐसा कहा जाता है कि सतत विकास एक आदर्श है जिसे आज के किसी भी समाज द्वारा इससे मिलते-जुलते किसी रूप में नहीं प्राप्त किया जा सका है। फिर भी, जैसा कि न्याय, समानता और स्वतंत्रता के साथ है, सतत विकास को एक आदर्श के रूप में

प्रोत्साहित करना चाहिए | एक लक्ष्य जिसकी प्राप्ति के लिए सभी मानव समाजों को प्रयत्नशील रहना चाहिए। उदाहरण के लिए, ऐसी नीतियां और कार्य जो शिशुमृत्युदर को कम कर दें, परिवार नियोजन की उपलब्धता को बढ़ा दे, वायु की गुणवत्ता बेहतर बना दें, अधिक प्रचुर मात्रा में शुद्ध जल प्रदान करें, प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण और सुरक्षा करें, मृदा अपरदन को कम करें और पर्यावरण में विषाक्त रसायनों की निर्मुक्ति को कम करें, जो सभी समाज को सही दिशा में एक सतत्‌ भविष्य की ओर ले जाएं। इस वांछित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, समुदायों को कुछ रूपांतरण करने पड़ेंगे जो बेहद अनिवार्य है। भावी समाज बनाने के लिए निम्नलिखित परिवर्तनों पर आम सहमति बनी है :

  • एक जनसांख्यिकीय परिवर्तन – निरंतर वृद्धि करती जनसंख्या से एक ऐसी जनसंख्या की ओर जो स्थिर हो।
  • एक संसाधन परिवर्तन : ऐसी अर्थव्यवस्था की ओर जो पूरी तरह से वृद्धि अभिभूत न हो, बल्कि प्रकृति की सृजनात्मकता पर अधिक भरोसा करे और पारिस्थितिक तंत्र की पूंजी को क्षीण होने से बचाए।
  • एक प्रोद्यौगिकीय परिवर्तन : प्रदूषण-गहन आर्थिक उत्पादन से पर्यावरण – हिततैषी प्रक्रियाओं की ओर)
  • एक राजनैतिक /सामाजिक परिवर्तन
  • एक सामुदायिक परिवर्तन

2. नीचे दिए गए शब्दों में अंतर उदाहरण सहित 420 शब्दों में स्पष्ट कीजिए।

(क) प्राथमिक अनुक्रम और द्वितीयक अनुक्रम

उत्तर – प्राथमिक अनुक्रम तब आरंभ होता है जब कोई नया क्षेत्र जिसमें पहले कभी कोई पारिस्थितिक समुदाय नहीं था, में पादपों और जंतुओं का समूहन हो जाता है। यह भूस्खलन या लावा के कारण नवउद्भासित शैल सतहों पर हो सकता है। अतः प्राथमिक अनुक्रम वहां होता है जहां पहले कोई समुदाय अस्तित्व में नहीं था जैसे कि शैलीय दृश्यांशन , नए बने डेल्टा, बालूटिखब्बे, ज्वालामुखीय द्वीप और लावा प्रवाह से बना स्थान । प्राथमिक अनुक्रम के विकास को दर्शाने के लिए उदाहरण के रूप में एक मॉडल के तौर पर अनावृत शैलों पर प्रवेश और उपनिवेशन है |

द्वितीयक अनुक्रम तब होता है जब किसी क्षेत्र में समुदाय अत्यधिक उद्देलित हो जाता है जिससे वह नष्ट हो जाता है, इसके फलस्वरूप एक नया समुदाय उस क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है। द्वितीय अनुक्रम प्राथमिक अनुक्रम से अधिक सामान्य है और यह अक्सर प्राकृतिक आपदाओं जैसे आग लगने, बाढ़ आने और आंधी तूफान के साथ ही मानवीय हस्तक्षेप जैसे पेड़ों और वनों की कटाई और के कारण होता है।

(ख) जैव विविधता में प्रत्यक्ष उपयोगिता और अप्रत्यक्ष उपयोगिता मूल्य

उत्तर – प्रत्यक्ष उपयोग के मूल्य वे हैं, जिनके लिए वस्तुओं को प्रत्यक्ष रूप से सुनिश्चित किया जाता है, उदाहरण के लिए खाद्य और इमारती लकड़ी । जैविक विविधता के घटकों के व्यापक परास का रखरखाव प्रत्यक्ष उपयोग का हो सकता है, खास तौर पर कृषि, दवा और उद्योग के क्षेत्र में। प्रत्यक्ष उपयोग में जंगलों, आर्द्र भूमि और अन्य पारिस्थितिक प्रणालियों को शामिल किया जा सकता है जहां से इमारती लकड़ी निकाली जाती है, गैर इमारती उत्पादों का संग्रह किया है, मछली पकड़ने आदि का कार्य किया जाता है। प्रत्यक्ष उपयोग मूल्यों का महत्त्व निष्कर्षणात्मक उपयोग के कारण हो सकता है, जहां संसाधनों का निष्कर्षण या खपत की जाती है या गैर निष्कर्षणात्मक उपयोग के कारण हो सकता है, जब इन संसाधनों का निष्कर्षण या निकास नहीं किए जाते हैं, जिन्हें उपयोग किया जाता है (उदाहरण के लिए पक्षी देखना, और पारितंत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान) |

अप्रत्यक्ष मूल्य उन सेवाओं के लिए होता है जो खपत के मदों को आधार देती हैं। विभिन्‍न अप्रत्यक्ष उपयोग मूल्य  –

  • गैर खपत मूल्य
  • सौंदर्य मूल्य
  • सांस्कृतिक और धार्मिक मूल्य
  • नैतिक मूल्य

3. नीचे दिए गए प्रश्नों का उत्तर 150 शब्दों में लिखिए।

(क) जैव विविधता हॉटस्पांट क्‍या है? भारत को बहु जैवविविधता वाला देश क्‍यों माना जाता है?

उत्तर – हॉट स्पॉट ऐसे क्षेत्र है जहां प्रजातियां भरपूर है, उच्च स्थानिकता है और जो लगातार खतरे में है।

मेयर्स (1988) ने दुनिया भर में 18 क्षेत्रों या “हॉट स्पॉट” को पहचाना है। दिलचस्प रूप से इन क्षेत्रों में लगभग 50,000 स्थानिक पादप प्रजातियां या विश्व की पादप प्रजातियों का 20 प्रतिशत हिस्सा केवल 746,000 वर्ग कि. मी. में या धरती की कुल सतह के केवल 0.5 प्रतिशत क्षेत्रफल में पाया जाता है।

भारत एक बहुजीव विविधता वाला देश क्‍योंकि –

  • 34 वैश्विक जैव विविधता वाले हॉट स्पॉट की सूची में से 4 हॉट स्पॉट को मेयर्स द्वारा भारत और उसके पड़ोसी देशों में रखा गया है।
  • भारतीय जैव विविधता की स्थानिकता बहुत उच्च है। देश के लगभग 33 प्रतिशत वनस्पति देश के लिए स्थानिक हैं। 49,219 पादप प्रजातियों में 5150 स्थानिक है और 47 फैमिली के तहत 141 जेनेरा में बांटी गई है, जो विश्व के अभिलेखित वनस्पति जगत का लगभग 30 प्रतिशत हैं।
  • भारत में 26 मान्यता प्राप्त स्थानिक केंद्र हैं, जो पहचान करने योग्य और अब तक वर्णित पुष्प वाले सभी पादपों में से लगभग एक तिहाई का घर है।
  •  भारत में दो प्रमुख क्षेत्र है, जिन्हें पेलिआर्कटिक और इंडो-मलायन कहते हैं तथा तीन बायोम है अर्थात उष्ण कटिबंधी आर्द्र जंगल, उष्ण कटिबंधी पर्णपाती जंगल और गर्म रेगिस्तान / अर्ध रेगिस्तान।
  • भारत में 10 भूगर्भय क्षेत्र हैं।
  •  भारत कृष्ट पौधों के उद्भव के 12 केंद्रों में से एक है।

(ख) महासागरीय जीवजात नितलस्य मंडल और वेलापवर्तीमंडल के बीच अंतर उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – समुद्री आवास दो भिन्‍न मंडलों में पहचाना जा सकता है (1) नितलस्थ मंडल जिनसे महासागर का बेसिन या तल बनता है भले ही गहराई कुछ भी हो (2) वेलापवर्ती मंडल जो मुक्त जल मंडल को दर्शाता है, बेसिन को भरता है|

समुद्र में जीवन विशेषतया प्रचुर नहीं है, हालांकि जीवों की विविधता बहुत ज्यादा है। प्राणियों का लगभग प्रत्येक प्रमुख वर्ग और शैवाल का प्रत्येक प्रमुख वर्ग महासागर में कहीं न कहीं पाए जाते हैं। संवहनी पौधे और कीट इसके अपवाद हैं। जीवन रूपों में गहराई के हिसाब से मिलने वाले अंतर के आधार पर समुद्री पारितंत्रों के विस्तार को वेलांचली, नेरिटांचली, वेलापवर्ती और नितलस्थ मंडलों में बांटा गया है।

वेलापवर्ती मंडल के जीवजात कुल समुद्र पृष्ठ का 90 प्रतिशत वेलापवर्ती क्षेत्र है। इससे पहले जिन दो क्षेत्रों की चर्चा की गई है, उसकी अपेक्षा इस क्षेत्र में जातियां कम हैं और जीवों की संख्या भी कम है। सबसे प्रचुरता में पाए जाने वाले वेलाप्रवर्ती पादपप्लवक केवल डायनोफ्लैजिलेट और डायटम हैं, जो मुख्य प्रकाशसंश्लेषी भरक हैं, दूसरे मांसभोजी हैं। समुद्री कुकम्बर और समुद्री अर्चिन अपरद तथा जीवाणु खाते हुए अधस्तल पर रेंगते हैं तथा मांसाहारी भंगुरतारा और केकड़ों का आहार बनते हैं।

नितलस्थ मंडल के जीवजात : यह समुद्र का तला बनाता है। यहाँ के जीव विषमपोषी होते हैं। दृढ़मूल जन्तु समुद्री लिली, समुद्री कोरल और स्पंज आदि है। धोंधे और सीपियां कीचड़ में धसी रहती हैं जबकि तारामीन, समुद्री कर्कटी और समुद्री अर्चिन इसकी सतह पर घूमते रहते हैं।

(ग) सतह और भूजल के बीच अंतर बताइए। जल की निम्नीकरण के विभिन्‍न कारकों को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – जल जो वर्षण के रूप में गिरता है, भूमि से नीचे चट्टानों में चला जाता है और भूजल के रूप में एकत्रित हो जाता है। पत्थरों की वह परत जिससे होकर यह नीचे अंतःस्त्रावित होता है, जलभर कहलाती है और जल को कुंए खोदकर उपयोग में लाया जा सकता है। भूजल मृदा की दो परतों में पाया जा सकता है। वातन का क्षेत्र, जहां मृदा के अन्तराल वायु और जल दोनों से भर जाते हैं।

सतह जल में सरिताएं, ताल, झीलें, मानव-निर्मित जलाशय और नहरें तथा मीठे जल के वेटलैंड / आर्द्रमूमि सम्मिलित है। जलचक्र का भाग होने के कारण सतह जल निकाय नवीकरणीय संसाधन माने जाते हैं, यद्यपि ये जलचक्र के अन्य भागों पर निर्भर होते हैं।

जल स्त्रोतों का निम्नीकरण

जलस्त्रोतों का निस्नीकरण और उनका संदूषण जिससे वे मानव उपभोग के लिए जल के स्त्रोत के रूप में अनुपयुक्त हो जाए, आज की एक गंभीर समस्या है। हमारे अधिकांश जल निकाय जैसे नदियां, झीलें, महासागर, नदमुख और भूजल निकाय सघन कृषि, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण और वनोरोपण के कारण गंभीर प्रदूषण का सामना कर रहे हैं। नदियों और झीलों में मृदा अपरदन के कारण सिल्ट,“गाद का जमा होना उनकी जलधारण क्षमता को निरंतर कम करता जाता है जिससे वर्ष दर वर्ष भयंकर बाढ़ आती है। आज हम सुरक्षित पेयजल की कमी की स्थिति का सामना औसत से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों और उन क्षेत्रों में भी कर रहे हैं जहां प्रचुर जल निकाय हैं। वाहित मल (सीवेज) और औद्योगिक वहिःस्त्रावों का जल निकायों में विसर्जन व सिर्फ जल को प्रदूषित करता है बल्कि अक्सर जलीय पादपों और शैवाल प्रफुल्लनों की वृद्धि भी बढ़ा देता है, जिससे अंततः जलनिकाय लुप्त हो जाते हैं। यह जल के विभिन्‍न जीवों जैसे मछलियों का अपक्षय और विनाश भी करता है।

(घ) भूमंडलीय कार्बन चक्र को संक्षिप्त में चित्र की सहायता से समझाइए।

उत्तर – कुछ कार्बन एक दीर्घकालिक चक्र में प्रवेश कर जाती है जिसे भूमंडलीय कार्बन चक्र कहते है। इस चक्र में कार्बन, कार्बनिक तत्व के रूप में दलदल को पीट परतों और भूरमूमियों (10019708) में अथवा अघुलनशील कार्बोहाइड्रेटों (जैसे कि अघुलनशील कैल्सियम कार्बोनेट 0४00, ) के रूप में विभिन्‍न समुद्री सीपियों में जलीय तंत्रों के तलीय अवसादनों में संचित हो जाता है। यह अवसादी कार्बन अंततः: अवसादी शैलों जैसे चूना पत्थर और डोलोमाइट में परिवर्तित हो जाता है। गहरे महासागरों में ये कार्बन लाखों वर्षों तक दबा रह सकता है जब तक कि कोई भूवैज्ञानिक गति इन शैलों को समुद्र तल पर ऊपर नहीं ले आए। ये शैल अपरदन द्वारा उद्मासित होकर अपने कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बोनेटों और बाइकार्बोनेटों को सरिताओं और नदियों में निर्मुक्त कर देते हैं। कठोर जल सामान्यतः कभी न कभी चूना पत्थरों से प्रवाहित होता है और इनके कार्बोनेटों को ग्रहण कर लेता है जो जल को उबालने पर पात्र में “फर” के रूप में जगा हो जाता है। जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस भी कार्बन चक्र के भाग हैं जो अपने कार्बन यौगिकों को अनेक वर्षों बाद निर्मुकत कर सकते हैं। ये जीवाश्म ईंधन कार्बनिक यौगिक हैं जो अपघटित होने से पहले दब गए थे और फिर समय और भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के द्वारा ठोस अथवा द्रव हाइड़्रोकार्बन ईंधनों में रूपांतरित हो गए| जब जीवाश्म ईंघनों को जलाया जाता है तो उनमें भंडारित कार्बन 00, (चित्र 2.100) के रूप में वापस वायुमंडल में निर्मुक्त हो जाता है। वर्तमान में (भूमंडलीय कार्बन चक्र में वायुमंडल में 00, की अधिक सान्द्रता दिखती है| इसके परिणाम स्वरूप होनेवाली जलवायु परिवर्तन की परिघटना वर्तमान में प्रमुख पर्यावरणीय समस्याओं में सबसे अग्रणी है जिसका विश्व सामना कर रहा है।

4. किस तरह वन पारिस्थितिकी प्रणाली को समर्थन और वैश्विक तापमान को सीमित करता है। उदाहरण सहित 250 शब्दों में वर्णन कीजिए।

उत्तर – पारिस्थितिक महत्व :

  1. भूमंडलीय जलवायु का संतुलन : वन प्राकृतिक चक्रों जैसे जलचक्र और कार्बन चक्र को प्रभावित करके भूमंडलीय जलवायु को प्रभावी रूप से स्थिरीकृत करते हैं। आपने विद्यालय में इन चक्रों के विषय में पढ़ा होगा। जैसा कि आप जानते हैं वर्षा का स्थानिक और कालिक पैटर्न वनों द्वारा अत्यधिक प्रभावित होता है। कितना पानी मृदा में बना रहेगा और कितना बह जाता है जिससे कभी-कभी बाढ़ आ जाती है, यह भी वनाच्छद (#७७ ००५७) पर निर्भर करताहै। इसी प्रकार वन वायुमंडलीय कार्बन डाई ऑक्साइड के स्तर को भी प्रभावित करते हैं। वृक्ष जीवमात्रा कार्बन-डाइऑक्साइड को एक नियत स्तर पर बनाए रखती है। इसलिए वन कार्बन सिंक यानी वायुमंडल से कार्बन- डाईऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता के प्रमुख स्रोत की तरह काम करते हैं। दूसरे शब्दों में कार्बन सिंक एक प्राकृतिक या कृत्रिम रिजर्वायर (भंडार) होता है जो कुछ कार्बन युक्त रासायनिक यौगिकों को अनिश्चितकाल तक के लिए एकत्रित और भंडारित कर सकता है। जब लकड़ी को जलाते हैं तो यह निर्मुक्त होती है। इसका ग्रीनहाउस प्रमाव की मात्रा और भूमंडलीय तापन (91008 #आआं।9) पर सीधा असर होता है। दूसरे शब्दों में, अधिक वनों के होने से प्रकाश संश्लेषण के काल में वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड का अधिक उत्सर्जन होता है जिससे वायुमंडल में ग्रीनहाउस प्रभाव में कमी आती है। इसलिए ग्रीनहाउस प्रभाव को कम करने के एक उपाय के रूप में व्यापक स्तर पर वृक्षारोपण किया जाता है।
  • जैवविविघता का संरक्षण : वन जमीन पर जैवविविधता के सामान्य भंडार हैं क्योंकि ये सजीवों की उत्तरजीविता और वृद्धि के लिए आदर्श स्थितियां प्रदान करते हैं। प्रति इकाई क्षेत्र में प्रजातियों की संख्या वन में किसी भी अन्य थलीय पारिस्थितिक तंत्र की अपेक्षा कहीं अधिक होती है। उदाहरण के लिए, उष्णकटिबंधी वर्षावन पृथ्वी के भूक्षेत्र का 7% से भी कम क्षेत्र घेरते हैं लेकिन यहां सभी ज्ञात जीव प्रजातियों की 50 प्रतिशत से भी अधिक पाई जाती है| सभी ज्ञात पादपों में से लगभग 62% इन वर्षावनों में पाए जाते हैं। इसीलिए अमेजन और नील बेसिन के वर्षा वर्नों को बचाने के लिए अभियान निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। जैवविविधता को संरक्षित करने की आवश्यकता और महत्व के बारे में बढ़ती जागरूकता मनुष्यों की वनों के महत्व को समझने में सहायक हो रही है। क्या आप समझते हैं कि वर्षावनों की सुरक्षा के लिए ये जागरूकता अथवा अभियान पर्याप्त हैं। इस पर विचार कीजिए। हम संरक्षण के कुछ तरीकों के विषय में इस इकाई के अंतिम भाग में चर्चा करेंगे।
  • प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों और प्रक्रियाओं को सहारा देना : जैसा कि पहले बताया गया है वन कुछ कार्यों को करते हैं जो पारिस्थितिक तंत्रों और प्रक्रियाओं को प्रत्यक्ष रूप से सहारा देने के लिए महत्वपूर्ण है। इनमें से कुछ कार्य और प्रक्रियाएं निम्नलिखित हैं :
  • वन, पवन और जल की क्रिया की रोकथाम करके मृदा अपरदन को रोकते हैं। इस तरह ये उर्वर उपरिभृदा का संरक्षण करते हैं।
  • ये भूस्खलन को रोकते हैं और चक्रवातों तथा बाढ़ की प्रबलता को कम करते हैं।
  • मृदा अपरदन की रोकथाम करके; वन जलाशयों / रिर्जवॉयर समेत जलनिकायों में गाद के जमा होने (सिल्टिंग) को कम करते हैं।
  • वन विषैली गैसों तथा कणमय पदार्थों को अक्शोषित करके वायु की गुणवत्ता को बेहतर बनाते हैं।
  • ये जलभरों की सुरक्षा करते हैं और मीठे पानी की वर्षों तक आपूर्ति को सुनिश्चित करते हैं।

5. भारत के पास अत्यधिक क्षमता गैर परम्परागत ऊर्जा के स्त्रोत है। इस वाक्य की व्याख्या उदाहरण सहित 250 शब्दों में कीजिए |

उत्तर – ऊर्जा की मांग प्रति 14 वर्ष में दोगुनी हो जाती है और इसे किसी देश के विकास के एक सूचक के रूप में लिया जाता है। भारत, विश्व की 16 प्रतिशत जनसंख्या के साथ विश्व के कुल ऊर्जा उत्पादन के लगभग 3 प्रतिशत का उपभोग करता है; जबकि इसकी तुलना में अमेरिका में विश्व जनसंख्या का 6.25 प्रतिशत भाग है और वह कुल ऊर्जा उत्पादन के 30 प्रतिशत का उपयोग करता है। ऊर्जा उपयोग में निरंतर वृद्धि के बाद भी, भारत में प्रति व्यक्ति उपभोग अब भी अन्य देशों के तुलना में काफी कम है। आज भी, हमारी लगभग 80 प्रतिशत जनसंख्या ईंधन की लकड़ी, गोबर और कृषि अपशिष्टों पर निर्भर करती है। हम जानते हैं कि ऊर्जा के गैर-नवीकरणीय स्रोत जैसे जीवाश्म ई६ न, कोयला और पेट्रोलियम, लंबे समय तक चलने वाले नहीं है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई के कारण वन भी तेजी से कम हो रहे हैं।

भारत में ऊर्जा की आवश्यकताएं ऊर्जा स्रोतों की दो श्रेणियों से पूरी की जाती है जैसा कि नीचे दिखाया गया है।

भारत में अत्यधिक क्षमता के रूप में ऊर्जा एक गैर-परंपरागत स्रोत है। हमारे विविध भौगोलिक स्थिति ऊर्जा के गैर-परंपरागत ऊर्जा के स्रोतों जैसे सौर, वायु और ज्वारीय ऊर्जा आगे को बढ़ने में सहायता करते हैं। सौर ऊर्जा को भविष्य क्षमता के रूप में देख रहे हैं। जिसकी वजह से अंतर्राष्ट्रीय सौर संधि की स्थापना वर्ष 2015 में हुई। इस संधि की स्थापना के बाद भारत सरकार द्वारा पहल की गई। या विकासशील स्वच्छ हरित ऊर्जा में सहायता करेगा जो परंपरागत ऊर्जा जैसे कोयला, पेट्रोलियम और रेडियो

सक्रियता खनिज से समस्याएं उभर रहे हैं इसलिए हम कह सकते हैं ऊपर बताए गये गैर-परंपरागत स्रोत अग्रिम वर्षों के लिए एक ऊर्जा स्रोत है। परंतु, आज के समय में हमारे प्रमुख ऊर्जा स्रोत कोयला, जीवाश्म ईंधन, प्राकृतिक गैस, जलविद्युत शक्ति और परमाणु ऊर्जा | ये ऊर्जा के स्रोत को परंपरागत ऊर्जा स्रोत कहते हैं।

खंड – ख

6. नीचे दिए गए शब्दों को परिभाषित कीजिए। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर 50 शब्दों में लिखिए।

(क) पारिस्थितिक स्त्रीवाद

उत्तर – पारिस्थितिक स्त्रीवाद एक पूर्णतः नया दर्शन है। यह महिलाओं की जैविक, सृजनात्मक और मातृ भूमिका में आधारित है। पारिस्थितिक स्त्रीवाद पूर्वी ‘मां प्रकृति’ की अवधारणा से तत्काल संबन्ध जोड़ लेता है। विषय पर कुछ विशेषज्ञों केअनुसार ‘पूंजीवादी पितृसत्तात्मक जगत्‌ प्रणाली’ की स्थापना और उसका निर्वहन तीन उपनिवेशनों पर हुआ है- महिलाओं के, विदेशी जनों और उनकी भूमि और प्रकृति पर | प्रकृति की पारिस्थितिकी महिलाओं के शरीर के जीवविज्ञान से और प्रकृति का शोषण / दोहन महिलाओं के भूणों के शोषण से जुड़ा हे। यह आधुनिक विज्ञान और आर्थिक वृद्धि का विरोधी है क्योकि दोनों ही उग्र पुरुष प्रकृति की विशेषता है। यह जीवन निर्वहनी जीवनशैली जो प्रकृति के साथ मेल में हो और ‘स्त्रीवादी सिद्धांत’ द्वारा फैली हो, की कामना करता है। स्त्री और पुरुष दोनों की अधिक भलाई के लिए पारिस्थितिक स्त्रीवाद एक नई लैंगिक और जननात्मक पारिस्थितिकी गढ़ने का प्रयास करता है।

(ख) एजेंडा 21

उत्तर – एजेंडा 21 सतत विकास के संबंध में संयुक्त राष्ट्र की एक गैर-बाध्यकारी कार्रवाई योजना है। यह 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरियो में आयोजित पृथ्वी शिखर सम्मेलन (पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन) का एक उत्पाद है। यह संयुक्त राष्ट्र, अन्य बहुपक्षीय संगठनों और दुनिया भर में व्यक्तिगत सरकारों के लिए एक कार्यसूची है जिसे निष्पादित किया जा सकता है। स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक स्तरों पर।

एजेंडा 21 में “21” 21 वीं सदी के मूल लक्ष्य को संदर्भित करता है जहां वे तब तक अपने विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की उम्मीद कर रहे थे। इसकी पुष्टि की गई है और संयुक्त राष्ट्र के बाद के सम्मेलनों में कुछ संशोधन किए गए थे। चूंकि यह पाया गया कि 2000 एक अत्यधिक आशावादी तारीख थी, इसलिए इसकी नई समयावधि 2030 को लक्षित कर रही है। इसका उद्देश्य वैश्विक सतत विकास को प्राप्त करना है। एजेंडा 21 पहल का एक प्रमुख उद्देश्य यह है कि प्रत्येक स्थानीय सरकार को अपना स्वयं का स्थानीय एजेंडा 21 आकर्षित करना चाहिए। 2015 के बाद से, सतत विकास लक्ष्यों को नए एजेंडा 2030 में शामिल किया गया है।

(ग) भूमंडलीय तापन

उत्तर – CO2, तथा अन्य ग्रीन हाऊस गैसों की सांद्रता बढ़ने से ग्रीन हाऊस प्रभाव में वृद्धि हुई है। इससे विश्व स्तर पर तापमान बढ़ा है और इसे भूमंडलीय तापन कहा जाता है। अध्ययनों से पता चलता है कि सन्‌ 1860 की तुलना में 0.3″C – 0.6″C तापमान बढ़ चुका है और पिछले दो दशक बीसवीं सदी के सबसे गर्म दशक थे और उनमें भी खासतौर से सन्‌ 1998 का वर्ष अधिक गर्म था। इक्कीसवीं शताब्दी का दशक 2000-2010, सन्‌ 1850 से अब तक के समय अंतराल का सबसे अधिक गरम है जिसमें विशेष कर सन्‌ 2005 और सन्‌ 2010 सबसे अधिक दो गरम वर्ष हैं।

इस भूमंडलीय तापन से जलवायु का प्रतिरूप बदल सकता है जिससे कि समुद्र स्तर में वृद्धि हो सकती है। अनुमान लगाया गया है कि समुद्र तल 0.5॥1 से 111 तक बढ़ सकता है। समुद्र तल के बढ़ने का कारण एक तो स्वयं महासागरों के जल का तापीय प्रसार है और दूसरा हिमनदों एवं ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से प्राप्त होने वाला अतिरिक्त जल है। इसका तटीय प्रदेशों और द्वीप समूहों में रहने वाले लोगों पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

(घ) संकटदायी अपशिष्ट

उत्तर – संकटदायी अपशिष्ट उद्योग, किसी कारखाने अथवा किसी रासायनिक संयंत्र के रासायनिक सहउत्पाद होते हैं। ये घरेलू कार्यकलापों अथवा अस्पताल या किसी अनुसंधान प्रयोगशाला से भी निकल सकते हैं। ऐसे सशस्त्र संघर्ष जिनमें परमाणु या रासायनिक हथियारों का प्रयोग होता है, उनसे भी अत्यधिक मात्रा में संकटदायी अपशिष्ट निकलते हैं। उपर्युक्त में से किसी भी स्रोत से उत्पादित रसायन जो मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा हो, पर्यावरण को प्रदूषित करे अथवा अनुपयुक्त रूप से प्रबंधित अथवा निस्तारित किए जाने पर जीवन के लिए जोखिम का वाहक हो ‘संकटदायी’ कहलाता है।

7. नीचे दिए गए प्रश्नों का 150 शब्दों में लिखिए –

(क) लैण्डफिलिंग (भूमिक्षरण) एक महत्वपूर्ण तरीका अपशिष्ट निस्तारण को कैसे सहायता करता है।

उत्तर – लैन्डफिलिंग (भूमिमरण) द्वारा संकटदायी अपशिष्ट का निस्तारण अनेक देशों में एक महत्वपूर्ण विधि है। लैन्डफिलिंग का अर्थ है जमीन के नीचे हानिकारक पदार्थों को भंडारित करना। इसमें इस उद्देश्य के लिए आवंटित क्षेत्र में कचरे को ले जाया जाता है। भारत में ऐसे क्षेत्र अस्वच्छकर खुले गढ़्ढों से लेकर उचित रूप से प्रचालित सेनिटरी लैन्डफिल तक विस्तारित हैं। खुले गढ्ढे / खत्ते अपशिष्ट निस्तारण की खराब विधि है क्योंकि ये पर्यावरणीय समस्याऐं उत्पन्न करते हैं। उदाहरण के लिए, ये क्षेत्र के सौंदर्य को नष्ट कर देते हैं और चूहों तथा अन्य कृतक जीवों के लिए घर प्रदान करते हैं जो रोग फैलाते हैं। यदि कचरा खुला रहता है, तो वह सड़कर बदबू देने लगता है। अधिकांश खत्तों / गढ़ढों में कचरे को जलाया भी जाता है जिस से आसपास के परिवेश में धुंआ भर जाता है। इसके अतिरिक्त, वर्षा जल कचरे के ऊपर से होकर बहता है और अपने साथ नदियों में हानिकारक पदार्थों को भी बहा ले जाता है।

उचित रूप से प्रचालित सेनिटरी लैन्डफिल पर्यावरण को बहुत कम हानि पहुंचाती है। अपशिष्ट से भरे जाने वाले क्षेत्र को अरंध्र पदार्थ जैसे मृत्तिका (॥७,) अथवा उच्च घनत्व की पोलीएथिलीन (1075) प्लास्टिक की कला से अस्तरित किया जाना चाहिए जिससे आसपास के क्षेत्रों में अपशिष्ट के रिसाव को रोका जा सके | कचरे को पैक करके उस गढ़्ढे में भर दिया जाता है और प्रतिदिन उस पर मिट्टी की परत बिछा दी जाती है। मिट्टी की परत कीटों और कृतकों को कचरे तक पहुंचने से रोकती है। इन स्थानों के प्रचालक कचरे को जलाते नहीं है। जब सेनिटरी लैन्डफिल स्थान भर जाते हैं, तो अनेक समुदाय फिर उस स्थान को अंतिम रूप से आवरित करके बंद कर देते हैं और उस क्षेत्र का उपयोग मनोरंजन कार्यों के लिए करते हैं।

एक प्रारूपिक लैन्डफिल साइट तली में कृत्रिम द्विपतत और सबसे ऊपर एक परत होती है। एक द्विपरत लैन्डफिल की अनुप्रस्थ काट का संकल्पनात्मक डिजाइन चित्र में दिखाया गया है।

(ख) अम्ल वर्षा क्‍या है? इसके प्रभाव का वर्णन कीजिए।

उत्तर – अम्ल वर्षा या अम्ल हिमके रूप में आर्द्र निक्षेपण में नाइट्रिक अम्ल और सल्फ्यूरिक अम्ल उपस्थित होते हैं जो कि क्रमष: नाइट्रोजन के ऑक्साइडों और सल्फर के ऑक्साइडों की जल के साथ अभिक्रिया द्वारा बनते हैं।

जीवाष्म ईंधनों जैसे कोयला अथवा तेल जिनमें सल्फर वाली अषुद्धियाँ होती हैं, को जलाने से सल्‍्फर के ऑक्साइड जैसे सल्फर डाइऑक्साइड(SO2) और सल्फर ट्राइऑक्साइड(SO3) उत्पन्न होते हैं |इसी प्रकार उच्च नाइट्रोजन मात्रा वाले किसी कार्बनिक द्रव्य के जलने पर नाइट्रोजन के ऑक्साइड(NOX) अर्थात्‌ नाइट्रिक ऑक्साइड(NO2) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO3) बनते हैं। नाइट्रोजन के ऑक्साइड जंगलों में लगी आग, विद्युत्‌ ऊर्जा संयंत्र और मोटर वाहनों से भी उत्पन्न होते हैं।

अम्ल वर्षा के प्रभाव

अम्ल वर्षा वाले जल का 911 मान लगभग 4 होता है। ऐसे अम्लीय जल के अनेक हानिकारक प्रभाव हैं। इनकी नीचे चर्चा की गई है।

  • फसलों और पौधों पर प्रभाव : अम्ल वर्षा के फसलों और जंगलों पर विनाषकारी प्रभाव होते हैं| अम्ल वर्षा मृदा में उपस्थित महत्वपूर्ण खनिजों और पोषक तत्वों को विलेय कर सकती है। अम्ल वर्षा, मृदा जीवाणुओं और कवकों, जो पोषक तत्वों के चक्रण और नाइट्रोजन स्थिरीकरण में महत्वपूर्ण भमिका निमाते हैं, को भी प्रभावित कर सकती है |अतः मृदा की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है और पौधों की वृद्धि प्रभावित होती है।
  • जलीय निकायों और जलीय जीवों पर ग्रभाव : जलीय तंत्रों जैसे झीलों, नदियों और तालाबों पर भी अम्ल वर्षा के हानिकारक प्रभाव होते हैं। उनमें लम्बे समय तक अम्ल के एकत्रित होने से उनका फ़न कम हो जाता है जिससे उनमें उपस्थित पौधे और जीव प्रभावित होते हैं। अनेक जलीय पौधों और विभिन्‍न प्रकार की मछलियों की ऐसी परिस्थितियों के लिए संवेदना स्तर अलग-अलग होता है, अतः ये इन परिस्थितियों में जीवित नहीं रह सकते।
  • मनुष्यों के स्वास्थय पर प्रभाव : अम्ल वर्षा के लिए उत्तरदायी गैसें और अम्ल वर्षा में उपस्थित अम्ल मनुष्यों के स्वास्थय को भी प्रभावित कर सकते हैं। विषेषकर उनके फेफड़ों को और श्वसन तंत्र को। वायु से शुष्क निक्षेपण,मनुष्यों में हृदय और फेफड़ों संबधी समस्याओं जैसे: दमा और श्वसनीषोथ का कारण होते हैं।
  • पदार्थों पर प्रभाव :अम्ल वर्षा पुलों, इमारतों, प्रतिमाओं और स्मारकों को भी नुकसान पहुंचा सकती है। इससे धातुओं और पेंट का संक्षारण होता है अनेक ऐतिहासिक स्मारकों पर अब अम्ल वर्षा द्वारा होने वाले प्रभावों पर ध्यान दिया जा रहा है। भारतवर्ष में ऐसा एक स्मारक आगरा में स्थित त्ताजमहल है। ताजमहल का रंग पहले से कुछ धूमिल हो चुका है। संगमरमर और चूना पत्थर से बनी इमारतें अम्ल वर्षा द्वारा प्रभावित होती हैं।

(ग) राष्ट्रीय पर्यावरण विधि-विधानों के प्रर्व॑तन से उभरें मुद्दों का वर्णन कीजिए।

उत्तर – रास्ट्रीय पर्यावरण विधि – विधानों के प्रवर्तन से उभरे मुद्दे इस प्रकार हैं –

  • राष्ट्रीय स्तर पर तमाम नियमों एवं प्रावधानों के विश्लेषण के बाद यह देखने को मिलता है कि अधिकतर वर्तमान पर्यावरण विधेयक अनिवार्यत: दण्डनीय हैं न कि निरोधात्मक | उदाहरण के लिए एक बार रासायनों तथा पदार्थों के वायु अथवा जल अथवा मृदा में विसर्जित किए जाने पर ही अधिनियम लागू होगा? निरोधक उपायों ने शायद ही कभी लागू किया हो और न ही वे कारगर हुए हैं और संबद्ध ऐजेंसियाँ तभी कुछ काम किया करती हैं जब कुछ नुकसान हो चुका होता है।
  • पर्यावरण विधेयकों के लागू करने में अधिक गंभीर समस्या यह आती है कि कम्पनियों की सुरक्षा की क्रियाविधियों एवं उपकरणों की जांच करने तथा उन्हें निरापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) मंजूर करने या न करने में विभिन्‍न प्राधिकरणों के परस्परव्यापी अधिकार हैं। उदाहरण के लिए, यद्यपि जल एवं वायु प्रदूषण बोर्ड हो सकता है।NOC न दे, मगर हो सकता है कि नगरपालिका किसी औद्योगिक इकाई के लाइसेंस दे दें जिनके आधार पर वह निर्माण कार्य आरंभ कर दे।
  • कुछ उदाहरणों में पर्यावरण विधेयकों के अध्यादेशों में प्राधिकरणों की प्रकृति तथा उनके विशिष्ट अधिकारों एवं दायित्वों के विषय में कोई दिशा-निर्देश नहीं किए गए हैं। उदाहरण के लिए, 2009 में दिल्‍ली राज्य की सरकार ने रंगदार प्लास्टिक थैलों के निर्माण एवं उपयोग पर प्रतिबंध लगाया था लेकिन चूक उपयोग करने वालों पर कार्यवाही करने के कोई भी नियम नहीं बनाए थे। अतः जब राज्य के पर्यावरण विभाग ने देखा कि कुछ फैक्ट्रियां प्रतिबंधित थैले बना रही थीं तो उनके पास प्रावधान नहीं था कि क्‍या कार्यवाही की जाए। इसके उपरांत दिल्ली सरकार ने इस बिल में 2011 में संशोधन किया और शहर में पलास्टिक बैग के उपयोग, भंडारण, बिक्री और निर्माण पर पूर्ण प्रतिबध॑ कर दिया पर खराब कार्यान्वयन और मजबूत नियमों के अभाव में यह अभी तक शहर में कोई प्रभाव नहीं डाल सका है|
  • भारत में पर्यावरण विधानों का एक समान पहलू यह है कि उनके लागू करने में जनता का हाथ बंटाना शामिल नहीं किया गया। पर्यावरण को हानि पहुंचाकर लाभ कमाने वाले उद्यमों का भली प्रकार प्रतिनिधित्व होता एवं उनके हितों की रक्षा की जाती है मगर यह एक आम आदमी जो प्रदूषण एवं निम्नीकरण के परिणामों से पीड़ित होता है उसकी कहीं सुनवायी नहीं है।
  • कभी-कभार धन के अभाव के कारण विधेयकों का लागू करना कठिन होता है। उदाहरण के लिए, भारत की नदियों के प्रदूषण का मामला है। यह सर्वविदित है कि नदियों के प्रदूषण का मुख्य स्रोत घरेलू जल-मल है जिसे नगरपालिकाएं बड़ी लापरवाही से निकटतम नदियों में छोड़ देते हैं। हर कोई जानता है कि नगरपालिका अपशिष्ट के उपचार के लिए प्रौद्योगिकी उपलब्ध है। परंतु इसका खर्चा बहुत सी तथा अधिकतर नगरपालिकाएं बर्दाश्त नहीं कर सकरती।
  • जनता का विरोच भी पर्यावरण कानून-व्यवस्था को लागू करने में बाधा बना हुआ है। उदाहरण के लिए, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने नयी दिल्‍ली के सभी सार्वजनिक वाहनों के लिए CNG का इस्तेमाल अनिवार्य घोषित किया। इसके आदेश के पालन कराने में सरकार ने काफी अधिक समय लिया।
  • इसी प्रकार जनता ने सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश का भी समर्थन नहीं किया जिसमें 45 वर्ष से अधिक पुराने सार्वजनिक वाहनों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गाया है।

(घ) पर्यावरणीय नीतिशास्त्र क्या है? हमारे पर्यावरण के लिए नीतिशास्त्र के नये नियमों की आवश्यकता क्‍यों है।

उत्तर – ‘पर्यावरणीय नीतिशास्त्र’ का उपयोग करते है तो हमारा अर्थ इससे उस विषय से है जिसमे मनुष्यों के नैतिक संबन्धों का और पर्यावरण तथा उसके गैर-मानव घटकों के नैतिक स्तर का भी अध्ययन किया जाता है।

हमें पर्यावरण के लिए नीतिशास्त्र के नए नियमों की आवश्यकता क्‍यों है? इसके उत्तर में तीन कारक सम्मिलित हैः

  1. प्रकृति पर नए प्रभाव: चूंकि हमारी आधुनिक प्रोद्योगिकीय सभ्यता प्रकृति को अत्यधिक प्रभावित करती है. अतः हमें इन नए प्रोद्यौगिकीय कार्यों के नीतिगत्‌ परिणामों की पड़ताल अवश्य करनी चाहिए।
  • प्रकृति के बारें में नयी जानकारी/ ज्ञान आधुनिक विज्ञान उन तरीकों से ये समझाता है कि हमने किस प्रकार पर्यावरण को परिवर्तित कर रहे है जिनसे पहले इसे नहीं समझा गया था, अतः नए नीतिगत्‌ मुद॒दें उठ रहे हैं। उदाहरण के लिए, पिछले दक्षक तक कुछ व्यक्ति ही ये मानते थे कि मनुष्य के कार्यकलाप वैश्विक पर्यावरण को परिवर्तित कर सकते है। आज, जबकि वैज्ञानिक मानते है कि जीवाश्म ईंघनों को जलाने और वनों को काटने से वायुमंडल में कार्बन डाई ऑक्साइड की मात्रा में वृद्धि हुई है और यह कि इसमे हमारी जलवायु में परिवर्तन हुआ है। अत: अब वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर महत्व दिया जा रहा है।
  • नैतिक सरोकार का विस्तार: कुछ व्यक्ति तर्क करते है कि जंतु, वृक्ष तथा पत्थरों तक में सामान्य और विधिक अधिकार है। इन विस्तारित सरोकारों ने नए नीतिशास्त्र के लिए नई आवश्यकता की पैरवी की है।

मानव इतिहास के अधिकांश भाग मे, नीतिशास्त्र मानवीय अधिकारों” पर व्यक्ति के, परिवार के और जातीय समूहों के अधिकारों- पर केन्द्रित रहा है। जबकि, अब नीतिशास्त्र में जंतुओं, पादपों और पर्यावरण के अधिकारों को भी मानवीय अधिकारों से परे नियम

और उनको उपयोग करने के निए सम्मिलित किया है।

8. “वैश्विक जैव विविधता में अधिवास विनाश को एक सबसे महत्वपूर्ण खतरा के रूप में पहचाना गया है।” इस वाक्य के कथन को वर्तमान संदर्भ में उदाहरण सहित 250 शब्दों में व्याख्या कीजिए।

उत्तर – अधियास के विनाश को आज वैश्यिक जैव विविधता के लिए सबसे महत्वपूर्ण जोखिम के रूप में मान्यता दी गई है और इस पर दुनिया भर की अधिकांश प्रजातियों के नष्ट हो जाने का दायित्य है| इसमें शामिल हैं ;

  • भूमि उपगोग के लिए जंगलों को काटना (उदाहरणतः विकास, खेती आदि के लिए इन्हें काटना), बड़े पैमाने पर लकड़ी का इस्तेमाल और छोटे पैमाने पर दुकड़ों में खेती | खेती के लिए विस्थापन  को अफ्रीका में 70 प्रतिशत छंगलों की कटाई, एशिया में 60 प्रतिशत जंगलों की कटाई और अमेरिका में 38 प्रतिशत जंगलों की कटाई के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
  • मत्यय संकक्षन के लिए मैग्रोय स्थानों का विनाश
  • कोरल (00818) का खनन और विनाश
  • भूमि उपयोग के लिए झीलों का सपांतरण
  • इमारती लकड़ी और जलायन लकड़ी का बहुत अधिक इस्तेमाल
  • अधियासों फो मनुष्यों द्वारा जलाना (उदाहरण के लिए विश्थापन खेती के लिए छंगलों को जलाना और मवेशियों फे लिए चाऐ की मात्रा बढ़ाने हेतु धास के मैदानों में आग लगाना।)
  • नदियों के बांध
  • मीठे पानी के जलाशयों में तलछट और कीचड़ का जमाव
  • प्रदूषण से भी प्राकृतिक अधिवासों में बहुत अधिक बाधा आती है। औद्योगिक अपशिष्ट से गंभीर नुकसान होता है, खास तौर पर जलीय अधियासों पर। उदाहरण के लिए, 1950 और 1960 के दशक में फीट नाशकों, खास तौर पर फ्लोरीन युक्त हाइड्रोकार्यन (जैसे डीडीटी) से कई पक्षियों की आबादी में कमी आई. जैसे बाल्ड इगल, ब्राउन पेलिकन |

कई देशों में कुछ ही ऐसे प्राचीन क्षेत्र हैं, जिन्हें मनुष्यों द्वारा किसी भी प्रकार से अब तक बदला नहीं गया है। जय इन अधियासों को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जाता तो उन्‍हें वे छोटे टुफड़ों में यांट देते हैं, विकास फे दौर में अधिवास के हीप बना दिए जाते है। विभाजन करने से प्रजातियों को अधिक प्रकाश, हया और तापमान मिलता है जो प्राकृतिक तौर पर मिलने वालौ मात्रा से अधिक होता है और इस प्रकार प्रजातियों की उत्तर जीविता के लिए उनके भोजन और पानी के स्रोतों में कमी आती है और प्रजनन के लिए भी कुछ साथी ही मिलते हैं। विभाजित दृश्यावली में कई प्रजातियों में अपने प्रकार की जातियों से अलग होने के परिणामस्वरूप आंतरिक प्रजनन होने लगता है जिससे उनके आनुवंशिक विविधता को नुकसान पहुंचता है तथा स्थानीय स्तर पर वे लुप्त हो जाती हैं।

प्रजातियों की तीन चौथाई से अधिक संख्या को आज उनके वन्य अधिवासों के विनाश के कारण लुप्त होने का खतरा है। इन प्रजातियों की बड़ी संख्या उष्ण कटिबंधी क्षेत्रों से हैं, जहां मानव आबादी बहुत अधिक विस्फोटक रूप से बढ़ी है और अधिवासों का विनाश तेजी से हुआ है। उष्ण कटिबंधी वर्षा वनों में धरती की सतह का केवल 7 प्रतिशत आता है, फिर भी यहां कुल प्रजातियों में से लगभग तीन चौथाई प्रजातियां निवास करती हैं| आज इन जंगलों को चिंताजनक दर से नष्ट किया जा रहा है।

9. प्राथमिक प्रदूषक और द्वितीयक प्रदूषक के बीच अंतर स्पष्ट कीजिए। प्रदूषक किस तरह मानव तथा पर्यावरण में हानिकारक का कार्य करते हैं। इस प्रश्न का उत्तर 250 शब्दों में लिखिए।

उत्तर- वायु प्रदूषकों के प्रकार-सम्पूर्ण धरती की गुणता में वायुमण्डलीय प्रदुषण एक प्रकार का अनचाहा परिवर्तन है। इंधन के

जलने से, ज्वालामुखी फटने से, जंगल की आग के धुएं से, वनस्पतियों से उत्पन्न परागकणों से तथा विद्युत स्फुरण भी प्राय: वायुमण्डल

को प्रदूषित करते हैं। वायु प्रदूषक कारकों को तीन प्रकार से वर्गीकृत किया गया है-

1, प्राकृतिक प्रदूषक-माना गया है कि प्राकृतिक प्रदूषक उतने ही प्राचीन हैं, जितनी यह धरती प्राचीन है। इस प्रकार के प्रदूषकों से प्रकृति स्वयं अपनी व्यवस्था के अनुसार बचाव करती है और इस प्रकार कहा जा सकता है कि इससे कोई गम्भीर क्षति नहीं होती।

2, प्राथमिक प्रदूषक-मनुष्य के कार्यकलापों के कारण समाज में लकड़ी, कोयला, गैस जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड और कार्बन

मोनोऑक्साइड वायुमण्डल में प्रवेश कर जाती है। इसके साथ-साथ अन्य प्राथमिक प्रदूषक-नाइट्रोजज ऑक्साइड, हाइड्रोकार्बन और निलंबित कणाकार पदार्थ भी वायुमण्डल में उपस्थित रहते हैं।

3, द्वितीयक प्रदूषक-रासायनिक अभिक्रिया के फलस्वरूप सल्‍्फर डाइऑक्साइड और सल्फर ट्राइऑक्साइड जैसे हानिकारक द्वितीयक प्रदुषक वायुमण्डल में बनते हैं, जिन्हें 2SO2 + 02-> 2SO3 माना जाता है और इसके पश्चात्‌ सल्‍्फर डाइऑक्साइड, वायुमण्डल में जलवाष्प के साथ मिलकर सलफ्यूरिक अम्ल (HSO4) की बुंदें बनाता है, जो द्वितीयक प्रदूषक है। इसे SO3 + H20 – H2SO4, माना जाता है।

कुछ प्रमुख वायु प्रदुषक-बहुत अधिक मात्रा में वायु प्रदूषक उत्पन्न होते हैं तथा स्वास्थ्य और पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। अब कुछ इसी प्रकार के प्रदूषकों का वर्णन किया जा रहा है-

1, सल्फर ऑक्साइड-माना गया है कि सल्‍्फर ऑक्साइड धरती के पेड्-पौधों के साथ जीव-जन्तुओं के लिए बहुत हानिकारक है। यह वायुमण्डल में ओजोन हाइड्रोजन पर जल अथवा वाष्प के साथ भी अपनी क्रिया करता है। इसको विषैला और हानिकारक वायु प्रदूषक माना जाता है।

2, नाइड्रोजन के ऑक्साइड-धरती पर ईंधन के उच्च तापमान पर जलाये जाने के फलस्वरूप वायुमण्डल में नाइट्रोजज ऑक्साइड

उत्पन्न होता है। नाइट्रोजन के उच्च तापमान पर ऑक्सीजन के साथ मिलने से नाइट्रिऑक्साइड बन जाया करती है और इससे सांस में अवरोध उत्पन्न होता है।

3, हाइड्रोकार्थन-कार्बन और हाइड्रोजन के संयोग से हाइड्रोकार्बन का निर्माण होता है। ये मनुष्यों पर सीधे प्रभाव डालते हैं और

इससे कैंसर का रोग उत्पन्न होता है। यह कोयले के अनुचित रूप से जलने के कारण ही उत्पन्न होता है।

4, कार्बन मोनोऑक्साइड-यह माना गया है कि कार्बन मोनो ऑक्साइड किसी भी ईंधन के अपूर्ण रूप से जलने से उत्पन्न होता है और यह रक्त की ऑक्सीजन क्षमता को कम कर देने में सहायक माना गया है।

5, कार्बन डाइऑक्साइड-कागज, पत्तियों, तम्बाकू तथा कार्बन युक्त अन्य सामग्री के जलने से कार्बन डाईऑक्साइड का उत्पादन

होता है और इसका स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ता।

6. सीसा प्रदूषण मोटर-गाड़ियों से निकलने वाले धुएं से वायुमण्डल में प्रवेश करने वाला सीसा एक रासायनिक प्रदूषण होता है।

आग युक्‍त वायु व्यक्ति के सांस द्वारा शरीर में प्रवेश करती है तो इससे गुर्दे और जिगर पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

7. निलंबित या तैरते हुए कणाकार पदार्थ-छोटे-छोटे राख और धुएं के कण द्रव की तरल बुंदों को कणाकार बनाकर वायुमण्डल

में तैरते रहते अथवा लटकते रहते हैं। वायुमण्डल में इनका प्रभाव कुछ सेकेन्ड से लेकर महीनों तक रहता है, लेकिन इनसे कोई पर्यावरणीय प्रदूषण नहीं होता।

8, धूप्रपान-तम्बाकू, अफीम, धतृरा और अन्य जड़ी-बूटियों का धुआं पीने को धूम्रपान कहा गया है। स्वास्थ्य के लिए धूम्रपान

अनेक रोगों की समस्या बनता है जिसमें गले के रोग, श्वास नली में शोथ, इृदय रोग आदि बीमारियों की सम्भावना होती है और धूप्रपान

से पर्यावरण भी प्रदूषित होता है।

वायु प्रदूषण हमारे वातावरण तथा हमारे ऊपर अनेक प्रभाव डालता है। उनमें से कुछ निम्नलिखित है-

1. हवा में अवांछित गैसों की उपस्थिति से मनुष्य, पशुओं तथा पक्षियों को गंभीर समस्थाओं का सामना करना पड़ता है। इससे दमा, सर्दी-खाँसी, अंधापन, श्रवणीय इन्द्रियाँ कमजोर होना, त्थचा रोग जैसी बरीमारियाँ पैदा होती हैं। लंबे समय के बाद इससे अनुवांशिकीय एवं प्रजनन सम्बन्धी विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और अपनी चरमसीमा पर यह घातक भी हो सकती है।

2. वायु प्रदूषण से सर्दियों में कोहरा छाया रहता है, जिसका कारण धुएँ तथा मिट्टी के कणों का कोहरे में मिला होना है। इससे प्राकृतिक दृश्यता में कमी आती है तथा आँखों में जलन होती है और साँस लेने में कठिनाई होती है।

3. ओजोन परत, हमारी पृथ्वी के चारों ओर एक सुरक्षात्मक गैस की परत है, जो हमें सूर्य से आनेवाली हानिकारक अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाती है। वायु प्रदूषण के कारण जीन अपरिबर्तन, अनुवांशिकीय तथा त्वचा कैंसर के खतरे बढ़ जाते हैं।

4, वायु प्रदूषण के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ता है, क्योंकि सूर्य से आने वाली गर्मी के कारण पर्यावरण में कार्बन-डाइ-आक्साइड,

मीथेन तथा नाइट्रस आक्साइड का प्रभाव कम नहीं होता है, जो कि हानिकारक है।

5. वायु प्रदूषण से अम्लीय वर्षा के खतरे बढ़े हैं, क्योंकि बारिश के पानी में सल्‍्फर-डाइ-आक्साइड, नाइट्रोजज आक्साइड आदि जैसी जहरीली गैसों के घुलने की संभावना बढ़ी है। इससे फसलों, पेड़ों, भवनों तथा ऐतिहासिक इमारतों को नुकसान पहुँच सकता है।

6. मानव तथा अन्य प्राणियों के समान पौधे भी वायु प्रदूषण से प्रभावित होते हैं। इससे पौधों की वृद्धि प्रभावित तो होती ही है, उनसे होने वाला उत्पादन भी घट जाता है।

7. वायु प्रदूषण की वजह से स्मारकों, निर्जीव पदार्थों और मूतियों को भी नुकसान पहुंचता है। मथुरा रिफाइनरी से निकलने वाले प्रदूषकों के कारण ताजमहल और मथुरा के प्राचीन मंदिर प्रभावित हो रहे हैं। उसी प्रकार दिल्ली रेलवे स्टेशन के इंजनों के धुंए तथा इंद्रप्रसथ्थ बिजली के घर के कोयले की राख से लाल किले के पत्थर प्रभावित हो रहे हैं।

8. सीसा, पारा और कैडमियम के प्रभाव के कारण रक्तचाप बढ़ सकता है तथा अनेक प्रकार के हृदय रोग हो सकते हैं। कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह आदि के लिए वायुमंडल में सल्‍्फर-डाइ-ऑक्साइड और नाइट्रोजन-डाइ-ऑक्साइड की अधिकता को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। सल्फर-डाइ-ऑक्साइड से एम्फायसीमा नामक रोग भी हो सकता है।

प्रश्न 10. पर्यावरण निम्नीकरण के रूप में भारत में जन आंदोलन के किसी एक केस की आलोचना कीजिए। इस प्रश्न का उत्तर 300 शब्दों में लिखिए।

उत्तर-केस अध्ययन : बिस्थापित लोगों का पुनर्स्थापन एवं पुनर्वास-बड़ी-बड़ी विकास परियोजनाएं जैसे बड़े बांध, खनन राष्ट्रीय उद्योगों की घोषणा इत्यादि से क्षेत्रों में रह रहें समुदायों के लोगों को जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। इन योजनाओं के कार्यान्वयन हेतु इन लोगों को उनके घरों से, खेतों से हटा दिया जाता है।

इस प्रक्रिया से लोगों के मस्तिष्क पर एक मनोवैज्ञानिक असर होता है। मुख्य रूप से आदिवासी लोग इस प्रक्रिया से अत्यधिक प्रभावित होते हैं, क्योंकि ये लोग अपने चारों ओर के प्राकृतिक संसाधनों से बहुत निकटता से जुड़े होते हैं। जिस कारण से ये लोग दूसरे अनजान स्थान पर जाकर बस नहीं पाते हैं, इसलिए ऐसी परियोजनाओं, जिसमें लोगों को विस्थापित किया जाए, को वहां के स्थानीय लोगों की मर्जी के बिना क़्रियान्वित नहीं करना चाहिए।

अकेले भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हरित क्रान्ति को सफल बनाने हेतु हजारों बांधों का निर्माण किया गया, जिसके फलस्वरूप लाखों की संख्या में लोग विस्थापित हुए। बांधों का निर्माण एक तरह से इन गरीब लोगों की कीमत पर ही बनाये जाते हैं, जो शक्तिहीन होते हैं। सरकार को चाहिए कि इन विस्थापित लोगों हेतु कृषि भूमि उपलब्ध कराई जाए तथा इनको एक बेहतर जीवनयापन को सुविधएं दी जाएं, लेकिन कुछ हो स्थानों पर हो पाया है। अधिकतर मामलों में ये सभी सुविधाएं विस्थापित लोगों को उपलब्ध कराने से सरकार विफल रही है।

पुनर्वास के लिए वैकल्पिक भूमि की आवश्यकता पड़ती है। यद्यपि हमारे अतिजनसंख्या वाले देश में अच्छी कृषि भूमि की उपलब्ध

ता बहुत कम है। अत: अधिकतर परियोजनाओं से प्रभावित लोगों को व्यर्थ बंजर भूमि उपलब्ध कराई जाती है। पुनर्वास का अर्थ मात्र

भूमि प्रदान करना नहीं है, बल्कि उनके परिवार की और सुविधाओं का ध्यान देना भी है।

नर्मदा बचाओ आन्दोलन एक ऐसा अभियान है, जो कई दशकों से चल रहा है और यह महान लड़ाई वहां के रहने वाले लोग अपनी

उर्वर भूमि को बचाने हेतु लड़ रहे हैं। यह आन्दोलन यह दिखाता है कि लोग अपनी भूमि के लिए कितने गंभीर एवं मरने के लिए तैयार हो सकते हैं।

नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध परियोजना का उद्घाटन 1961 में पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था। सरकार के अनुसार इस परियोजना से मध्य प्रदेश, गुजरात तथा राजस्थान के सूखा ग्रस्त क्षेत्रों की 2.27 करोड़ हेक्टेयर भूमि को सिंचाई के लिए जल मिलेगा, बिजली का निर्माण होगा, पीने के लिए जल मिलेगा तथा क्षेत्र में बाढ़ को रोका जा सकेगा। नर्मदा परियोजना ने एक गंभीर विवाद को जन्म दिया है। एक ओर इस परियोजना को समृद्धि तथा विकास का सूचक माना जा रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप सिंचाई, पेयजल की आपूर्ति, बाढ़ पर नियंत्रण, रोजगार के नये अवसर, बिजली तथा सूखे से बचाव आदि लाभों को प्राप्त करने की बात की जा रही है। वहीं दूसरी ओर अनुमान है कि इससे तोन राज्यों की 37000 हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो जाएगी, जिसमें 13000 हेक्टेयर वन भूमि है। यह भी अनुमान है कि इससे 248 गांव के एक लाख से अधिक लोग विस्थापित होंगे, जिनमें 58 प्रतिशत लोग आदिवासी क्षेत्र के हैं। नर्मदा बचाओ आंदोलन जो एक जन आंदोलन के रूप में उभरा, कई समाजसेवियों,, पर्यावरणविदों, छात्रों, महिलाओं , आदिवासियों , किसानों तथा मानव अधिकार कार्यकर्ताओं का एक संगठित समूह बना। आंदोलन ने विरोध के कई तरीके अपनाए; जैसे-भूख हड़ताल, पदयात्राएं, समाचार पत्रों के माध्यम से, तथा फिल्‍मी कलाकारों तथा हस्तियों को अपने आंदोलन में शामिल कर अपनी बात आम लोगों तथा सरकार तक पहुँचाने की कोशिश की। 17 अप्रैल 2006 को नर्मदा बचाओं आंदोलन की याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने संबंधित राज्य सरकारों को चेतावनी दी कि यदि विस्थापितों का उचित पुनर्वास नहीं हुआ तो बांध का और आगे निर्माण कार्य रोक दिया जाएगा।

One thought on “Free BEVAE-181 Solved Assignment Hindi Medium (2020-21)

  1. Debashish

    Very good 👍👍👍👍👍

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *